एक से तीन वर्ष के बच्चों को जरुरी पोषण

सामन्यतः इस उम्र में शारीरिक विकास दर धीमी होती है, बच्चों की दूसरे वर्ष से लेकर नवें वर्ष तक वार्षिक वजन में सामान्य वृद्धि 2 से 3 किलोग्राम और लम्बाई में वृद्धिदर 6 से 8 सेंटीमीटर होती है, और यही शारीरिक वृद्धिदर एक से तीन साल के साल के बच्चे की भी होती है, परन्तु एक से तीन साल के बच्चे खान-पान के मामले में केवल माँ पर ही निर्भर होते हैं, वह खुद अपनी इच्छा से कुछ नही खाते-पीते और इनके लिए आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा भी तीन वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों से भिन्न होती है। इस उम्र में, बच्चे के शारीरिक विकास को लगातार मॉनिटर करते रहना चाहिए। यदि बच्चे का वजन और लम्बाई समानुपात में नही बढ़ रही है तो इसका मतलब बच्चे को दिया जा रहा भोजन में सभी पोाषक तत्व आवश्यक मात्रा में एवं उचित अनुपात में नहीं हैं। एक से दो वर्ष- बच्चे को तीन बार रात के समय और तीन से चार बार दिन के समय गाय का सम्पूर्ण दूध (वसा सहित) देना चाहिए इसमें चीनी (शुगर) की मात्रा कम रखें। दूध की मात्रा 2-3 कप प्रतिदिन से ज्यादा न हो, अधिक दूध देने से बच्चे में आयरन की कमी आ सकती है। इसके अतिरिक्त समय 2-4 स्नैक्स प्रतिदिन दें। इस दौरान माँ का दूध (Breastfeeding) जारी रखी जा सकती है परन्तु उसे ही पोषण का मुख्य स्रोत न बनाये, बल्कि उसे फल, सब्जियां, अनाज आदि भी दें।

दो से तीन वर्ष

बच्चे को अधिक वसा की आवश्यकता नही होती है, इसलिए तीसरे वर्ष में बच्चे को दिए जाने वाले भोजन में कम वसा वाले प्रोडक्ट्स को शामिल करें। इस उम्र के बच्चों के लिए डाइटरी गाइडलाइन का पालन करना चाहिए सैचुरेटेड फैट, और शुगर की मात्रा का ध्यान रखा जाना चाहिए।बच्चे को फलों का जूस भी दिया जाना चाहिए परन्तु जूस की मात्रा 2-4 औंस से अधिक नही होना चाहिए। दो साल से बड़े बच्चे को बॉटल फीडिंग की जरूरत नही रहती है।

क्या न खाएं?

इस समय बच्चों को पॉपकॉर्न, नट्स, हार्ड कैंडी, च्युंगम, संपूर्ण अंगूर, कच्ची गाजर आदि नही खाना चाहिए। इस उम्र के बच्चों के लिए आयरन की कमी का सबसे ज्यादा खतरा होता है। इसलिए सुनिश्चित करें कि डेयरी प्रोडक्ट्स का सेवन अत्यधिक नहीं होना चाहिए। बच्चे के संतुलित विकास के लिए खाद्य पदार्थों का चयन और उनमें पाये जाने वाले पोषक तत्वों की जानकारी होना आवश्यक होता है। नीचे दी गई तालिका में, विभिन्न आहारों से मिलने वाले जरूरी पोषक तत्वों और एक से तीन वर्ष तक के बच्चों में उनकी आवश्यकता की जानकारी दी गई है।

जरुरी पोषक तत्वों की मात्रा

पोषक तत्व मात्रा
कुल कैलोरीज़ 1000-1200
कार्बोहाइड्रेट 130 g
फाइबर 19 g
प्रोटीन 13 g
वसा (fat) सभी स्रोतों से 33-45 g
विटामिन A 1000 IU
विटामिन B1 -थायमिन 0.5 mg
विटामिन B2 -राइबोफ्लेविन 0.5 mg
B3 – नियासिन 6 mg

नवजात शिशु के आहार से जुडी कुछ आवश्यक जानकारियां

जब कोई महिला पहली बार माँ बनती है, तो उसे जाहिर तौर पर बच्चे की देखभाल को लेकर बहुत से सवाल और चिंताएं होती है। ऐसी महिलाओं के पास बच्चे की देखभाल की उचित जानकारी होना आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर, बच्चोें को नहलाना-धुलाना, खिलाना-पिलाना और उसे होने वाली छोटी-छोटी समस्याओं में उसकी देखभाल करना। यहाँ आपको ऐसी ही कुछ महत्त्वपूर्ण बातों के बारें में जानकारी दी जा रही है।

I) शिशु को एक दिन में कितने दूध की ज़रूरत होती है?

  • नवजात शिशु पहले कुछ दिनों तक फॉर्मूला मिल्क बहुत कम मात्रा में दिया जा सकता है। दूसरे हफ़्ते में उन्‍हें अधिक दूध की ज़रूरत होती है। दूध की ज़रूरी मात्रा, हर शिशु की जरूरत के अनुसार अलग-अलग होती है।
  • अधिकतर बच्‍चे अपने आहार पैटर्न में ख़ुद को ढाल लेते हैं, लेकिन उनके द्वारा सेवन की जाने वाली मात्रा और उसे कितनी बार पिलाना है यह हर एक बच्चे पर अलग-अलग तरह से निर्भर करता है। कुछ शिशु थोड़ी-थोड़ी मात्रा में थोड़ी-थोड़ी देर में आहार दूध पीते हैं। वहीं कुछ बच्चे एक बार पेट भरने के बाद जल्दी दूसरी बार भूखे नहीं होते।
  • बच्चा कितना भी छोटा क्यों न हो उसे पता होता है कि उसका पेट भर गया है या नहीं। इसीलिए जब भी बच्चा दूध के लिए रोए तभी उसे दूध पिलाएं और जब उसकी इच्छा खत्म हो जाए तो उसके साथ जबरजस्ती न करें

II) कैसे पता चलता है कि बच्चा भूखा है-

  • यदि वह जाग जाए और हिलने-डुलने लगे
  • बार-बार अपने सिर को घुमाये और मुंह खोले
  • अपनी मुट्ठी या हाथ को चूसने लगे
  • बहुत अधिक भूखा होने पर रोने लगता है अथवा हलचल करने लगता है, ऐसी स्थिति में शिशु को दूध पिलाएं।

III) क्या नवजात बच्‍चे को पीने के लिए पानी दिया जा सकता है-

  • जब तक शिशु, स्तनपान कर रहा है अथवा फॉर्मूला मिल्क ले रहा है, तब तक उसे अतिरिक्‍त पानी पिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। 6 महीनों तक बच्चें को पानी नहीं दिया जाना चाहिए।

बच्चों को कैसे प्रभावित करता है निमोनिया?

निमोनिया एक घातक बीमारी है और सर्दियों में इसके होने की संभावनाएं और ज्यादा बढ़ जाती हैं। आंकड़े बताते हैं कि निमोनिया के शिकार सबसे ज्यादा बच्चे ही होते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में निमोनिया से जान गंवाने वाले हर पांच बच्चों में से एक बच्चा भारतीय होता है। निमोनिया फेफड़े का एक संक्रमण है। इसमें फेफड़े में गंभीर सूजन आ जाती है और उसमें पानी भर जाता है। डायबिटिक, कैंसर, अस्थमा आदि के मरीजों में यह बीमारी होने की सम्भावना सबसे ज्यादा होती है।

बच्चों तक कैसे पहुंचता है निमोनिया का वायरस?

  • जब बच्चा साँस लेता है तो संक्रमित कण हवा के माध्यम बच्चें के फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं।
  • साँस लेने पर बैक्टीरिया नाक और गले के माध्यम से फेफड़ों में चला जाता है। ऐसा होने की सम्भावना अक्सर तब ज्यादा होती है, जब बच्चें सोते हैं।
  • यदि बच्चें के श्वसन प्रणाली में संक्रमण ( सर्दी या इन्फ्लूएंजा, फ्लू ) हुआ हो या उसके बाद भी, निमोनिया होने की सम्भावना ज्यादा होती है।
  • वायरल संक्रमण जैसे- खसरा या चेचक इत्यादि से होने वाली जटिलताओं के कारण।
  • यदि कोई बच्चा साँस के द्वारा किसी प्रकार के खाने की सामग्री, आमाशय रस या उल्टी इत्यादि को अंदर ले ले तो बैक्टीरिया उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है और ऐसे बच्चों को एस्पाइरेसन निमोनिया (aspiration pneumonia) हो जाता है। यदि किसी बच्चें को कोई चिकिस्कीय समस्या है जैसे- मिर्गी के दौरे पड़ना या स्ट्रोक इत्यादि है तो ऐसे बच्चों को एस्पाइरेसन निमोनिया होने की सम्भावना ज्यादा होती है।

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